अल्मोड़ा की नगरपालिका ने बंदरों से हार मान ली है। हालांकि वह ऐसा स्वीकार करने को तैयार नहीं है और अभी सिर्फ़ युद्धविराम की बात कर रही है। दरअसल बदरों की नसबंदी का अभियान लक्ष्य हासिल करने से पहले ही रोकना पड़ा है। यह फिर कब शुरु होगा और कब पूरा होगा इसे लेकर पालिका के पास कोई ठोस जवाब नहीं है। पहले भी बंदरों के आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए अभियान चला चुके लोग एक बार फिर आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं।
अल्मोड़ा के मोहन सिंह कहते हैं कि वह बंदरों के आंतक से परेशान हैं। बंदर घरों में घुसकर बिजली के तारों को तोड़ रहे हैं। बच्चों को बाजार में जाने-आने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
ऐसी ही परेशानियों को लेकर लोगों ने कई बार नगरपालिका, वन विभाग और जिला प्रशासन को ज्ञापन दिया और बंदरों को पकड़ने की मांग की। इसके बाद नगरपालिका प्रशासन हरकत में आया। पशु चिकित्सक योगेश शर्मा ने कहा कि हर शुक्रवार को बंदरों की नसबंदी की जा रही थी लेकिन बंदरों को बेहोश करने वाली दवाई समाप्त हो गई और नसबंदी ऑपरेशन्स रोकने पड़े। पिछले एक महीने में 100 बंदरों की नसबंदी भी नहीं हो पाई।
नगरपालिका के ईओ श्याम सुंदर ने कहा कि बंदरों की बेहोश करने की दवा मंगाई गई है। वन विभाग से लगातार संपर्क किया जा रहा है। जैसे ही दवा मिल जाएगी तो बंदरों को पकड़कर नसबंदी अभियान शुरु किया जाएगा। यह तब तक लगातार चलाया जाएगा जब तक नगर में इनका आतंक खत्म नहीं होता।
सामाजिक कार्यकर्ता मनोज सनवाल कहते हैं बंदरों की समस्या को लेकर लगातार वन विभाग। नगरपालिका और जिला प्रशासन को ज्ञापन देने के बाद कुछ दिनों तक बंदरों को पकड़ा गया लेकिन कोरोनाकाल में बंदरों की नसबंदी बंद कर दी है। यह सरकारी सिस्टम पर सवाल उठाता है। उन्होंने कहा कि अगर जल्दी ही दोबारा बंदरों की नसबंदी शुरु नहीं हुई तो उग्र आंदोलन चलाया जाएगा।